कृषि कानूनों की वापसी: चुनावी स्टंट या मास्टरस्ट्रोक ?

केंद्र की मोदी सरकार ने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का एलान कर दिया है और देश की जनता से माफी मांगी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले विवादित कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर बड़ा राजनीतिक कदम उठाया है।

बीजेपी जहां इस कदम को आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र मास्टरस्ट्रोक करार दे रही है, वहीं विपक्ष इसे चुनावी स्टंट बता रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि कृषि कानूनों को वापस लेना ज़रूरी था या मजबूरी था ?

कृषि कानूनों के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन को 1 साल से ज्यादा हो चुका है। पंजाब से शुरू हुआ ये आंदोलन अब पूरे देश में फैल चुका है। इस आंदोलन का असर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिला जहां बीजेपी को हार का मुंह देखना पड़ा। इस आंदोलन की वजह से बीजेपी और केंद्र सरकार की छवि किसान विरोधी बनती जा रही थी।

आगामी 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी शासित 4 राज्यों के भविष्य का फैसला होना है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में बीजेपी की सरकारों को जनता के दरबार में हाज़िर होना है। ऐसे में केंद्र सरकार उन सभी फैक्टर्स को दूर करने में जुटी है जिनकी वजह से लोगों में बीजेपी के खिलाफ गुस्सा है।

इसी दिशा में काम करते हुए मोदी सरकार ने पहले तो पेट्रोल से 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल से 10 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी कम कर दी। इस तरह से महंगाई पर शोर मचाने वाले विपक्ष को मोदी सरकार ने जवाब दिया।

इसके बाद मोदी सरकार ने नाराज़ चल रहे किसानों को मनाने के लिए कृषि कानून वापस लेने का एलान किया। किसान आंदोलन की वजह से उत्तर प्रदेश में बीजेपी को भारी नुकसान होने की आशंका जताई जा रही थी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तकरीबन 100 विधानसभा सीटों पर जाटों का प्रभाव है। पिछले कई दशकों से चुनाव दर चुनाव प्रचार कर बीजेपी ने जाट समुदाय पर अपनी पकड़ बनाई है। जाट समुदाय का बड़ा हिस्सा खेती-किसानी करता है।  

कृषि कानूनों के खिलाफ जाटो ने किसान आंदोलन को मजबूती दी। पारंपरिक तौर पर भी जाटों पर भारतीय किसान यूनियन का बड़ा प्रभाव है। इन लोगों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महापंचायत कर किसान नेता राकेश टिकैत के हाथ मज़बूत करने का काम किया है।

जिस तरह से बीजेपी नेताओं ने किसान नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक कार्टून ‘बक्कल तार देंगे’ को ट्वीट किया और बयान दिए उससे जाट किसानों में भारी गुस्सा है।

यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी के लिए धार्मिक धुर्वीकरण के आधार पर सपा, बसपा और कांग्रेस के वोटबैंकों में सेंध लगाना आसान है। अयोध्या मंदिर, कश्मीर में टारगेट किलिंग, पाकिस्तान या जिन्ना जैसे मुद्दों के सहारे बीजेपी आसानी से हवा बदल सकती है लेकिन 1 साल से संगठित हो रहे किसान उसके लिए एक चुनौती बन गए हैं।

किसान आंदोलन ने मुजफ्फरनगर दंगों के बाद दो फाड़ हुए जाटों और मुसलमानों को भी एकजुट कर दिया। किसान नेताओं ने बीजेपी की धर्म की राजनीति को भी चुनौती दी। कई मंचों से राकेश टिकैत इस बात को पुरज़ोर तरीके से कह चुके हैं कि धर्म के नाम पर लोगों को बांटा जा रहा है।

बीजेपी शुरू में किसान आंदोलन को पंजाब और हरियाणा का सूबाई आंदोलन बताकर सीमित करने की कोशिश की लेकिन जिस तरह से किसान नेताओं ने पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे दक्षिणी राज्यों में मोदी सरकार के खिलाफ प्रचार किया, उससे बीजेपी परेशानी में फंस गई   

बीजेपी ने किसान आंदोलन को सिखों के आंदोलन के तौर पर भी दिखाने की कोशिश की और उन्हें खालिस्तानी बताया लेकिन यूपी के किसान नेता राकेश टिकैत के अगुवाई करने की वजह से उसका ये तर्क भी खोखला साबित हुआ।

भारतीय किसान यूनियन का अच्छा खासा असर पश्चिम उत्तर प्रदेश में है। इसके साथ ही पूरे प्रदेश के किसानों की एकजुटता और सहानुभूति भी इनके साथ है। ऐसे में बीजेपी उत्तर प्रदेश में कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती है।

संयुक्त किसान मोर्चा ने जिस तरह से तमाम विधानसभा सीटों में महापंचायत करके बीजेपी के खिलाफ प्रचार की योजना बनाई, उसका भाजपा के पास कोई तोड़ नहीं है। बीजेपी के लिए राजनीतिक पार्टियों से निपटना आसान है लेकिन संगठित किसानों से जुझना भारी पड़ता नज़र आ रहा था।

लखीमपुरखिरी हिंसा के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव ‘किसान बनाम भाजपा’ का बन गया। गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी का इस्तीफा न होने की वजह से किसान भाजपा और मोदी सरकार से नाराज़ हैं। किसान नेता राकेश टिकैत अपनी हर महापंचायत में ‘वोट की चोट’ देने की अपील कर रहे हैं।

किसानों से टकराने का खामियाजा बीजेपी पंचायत चुनाव में भुगत चुकी है। पंचायत चुनाव में प्रदेश में सत्तारूढ़ होने के बावजूद जीत के लिए बीजेपी को कड़ा संघर्ष करना पड़ा। कुछ जगहों पर उसे हार का मुंह देखना पड़ा।

कहते हैं कि दिल्ली की सियासत का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुज़रता है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में कोई भी फेरबदल केंद्र की राजनीति पर बड़ा असर डालेगा।

इसी पशोपेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुद टीवी पर आकर कृषि कानूनों को वापस लेने का एलान करना पड़ा। हालांकि उन्होंने इन कानूनों को ग़लत मानने से इनकार कर दिया और कहा कि वो इसके फायदे किसानों को बताने में नाकाम रहे।

प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसी कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई है कि भविष्य में इस तरह के कानून नहीं लाए जाएंगे। इससे पहले भी मोदी सरकार भू-अधिग्रहण अध्यादेश वापस ले चुकी थी लेकिन इससे कोई सबक सीखने के बजाय उसने किसानों से फिर पंगा लिया और कृषि कानून लाई।

ऐसे में कृषि कानूनों की वापसी को विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र उठाया गया राजनीतिक कदम माना जा सकता है।

पीएम मोदी ने चुनाव के मुहाने पर ये तुरुप का इक्का चलकर विपक्ष के हाथ से एक बड़ा मुद्दा छीन लिया है। तेल के बढ़े दामों और किसान आंदोलन का निपटारा कर उन्होंने विपक्ष की धार को कुंद करने का काम किया है। अब इसका कितना असर विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा, ये आने वाला वक्त बताएगा।

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